गणेशजी सभी देवों में प्रथम पूजनीय और प्राथनीय तो हैं ही अपितू उनकी पूजा लगभग सभी धर्मों में की जाती है । उनकी पूजा के कोई भी शुभ कार्य आरंभ नही होता । इनके साथ ही क्या आप ये जानते हैं कि भगवान गणेशजी का जन्म कहां और कैसे हुआ । चलिए आज हम आपको बताते एकदंत भगवान गणेशजी के जन्म की कहानी के बारे में ।

जन्मकथा
मां जगदम्बिका कैलाश पर अपने अंत:पुर में विराजमान थीं। सेविकाएं उबटन लगा रही थीं। शरीर से गिरे उबटन को उन आदिशक्ति ने एकत्र किया और एक मूर्ति बना डाली। उन चेतनामयी का वह शिशु चेतन हो गया और उसने माता को प्रणाम किया और आज्ञा मांगी। मां ने उससे कहा गया कि बिना आज्ञा कोई द्वार से अंदर न आने पाए।

बालक डंडा लेकर द्वार पर खड़ा हो गया। भगवान शंकर अंत:पुर में जाने लगे तो उसने उन्हें रोक दिया। भगवान भूतनाथ ने देवताओं को आज्ञा दी कि इस बालक को द्वार से हटा दिया जाए। इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम आदि सब उस बालक के डंडे से आहत होकर भाग खड़े हुए, क्योंकि वह महाशक्ति का पुत्र जो था। जब भगवान शंकरजी ने देखा कि यह तो महाशक्तिशाली है, तो उन्होंने त्रिशूल उठाया और बालक का मस्तक काट दिया।

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जब मेहग को इस घटना की सूचना मिली कि उनके पुत्र का वध कर दिया गया है, तो उनका क्रोध भड़क उठा। पुत्र का शव देखकर माता कैसे शांत रहे। देवताओं पर घोर संकट खड़ा हो गया। वे सभी भगवान शंकर की स्तुति करने लगे।

तब शंकरजी ने कहा कि ‘किसी नवजात शिशु का मस्तक उसके धड़ से लगा दो, लेकिन ध्यान रहे कि तब उसकी मां का उस पर ध्यान न हो।’ देवता ढूंढने लगे ऐस शिशु लेकिन उन्हें रास्ते में एक हथनी का बच्चा अकेला मिला। उसी का मस्तक पाकर वह बालक गजानन हो गया। अपने अग्रज कार्तिकेय के साथ संग्राम में उनका एक दांत टूट गया और तब से गणेशजी एकदन्त हैं।