नई दिल्ली. 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के रुप मे मनाया जाता है. सोशल मीडिया पर इस संबंध में तमाम तरह के लेख और स्लोगन पढ़ने को मिल रहे हैं. हिन्दी दिवस के इस मौके पर आज हम आपको उस समय की ओर ले चल रहे हैं, जब हिन्दी को राजभाषा के रुप में स्थापित करने की बात की जा रही थी और इस पर जोर दिया जा रहा था.

बिहार सरकार सबसे आगे रही

हिन्दी को इस मुकाम तक पहुंचाने की सबसे पहले यदि किसी ने पहल की, तो वो थी तत्कालीन बिहार सरकार. राज्य सरकार ने इस सिलसिले में सबसे पहले सरकारी कार्यालयों के नाम, अधिकारियों के नाम और उनके पदनाम को हिन्दी में लिखने का निर्णय लिया.

सरकार ने दिखाई तेज़ी

इस काम में राज्य सरकार ने तेज़ी भी दिखाई. सबसे पहले सभी कार्यालयों के अधिकारियो ं के नाम और उनके पदनाम की सूची तैयार की गई. उसके बाद ये तय किया गया कि आखिर इसको हिन्दी में पुकारा किस नाम से जाएगा.

तैयार की गई सूची

सूची तैयार होने के बाद उस समय के हिन्दी की जानकारों की एक समिति बनाई गई. उसके बाद पदनामों की हिन्दी में शब्दावली तैयार की गई. समिति द्वारा बनाई गई नई शब्दावली स्वीकार किए जान ेके बाद ये नाम सरकारी कार्यालयों में प्रयोग में लाया जाने लगा.

नई शब्दावाली से समस्या

अब इतने दिनों से उस पुराने अंग्रेज़ी पद्दति के ढ़र्रे पर चल रहे लोगों के लिए अचानक से सामने आई  नई हिन्दी शब्दावली मुसीबत का सबब बन गई. लोगों को इन शब्दावलियों को समने में खासा दिक्तों का सामना करना पड़ रहा था. हिन्दी के ये नए शब्दावली उनके लिए ठीक वैसे ही थें, जैसे पहली कक्षा के बच्चे के सामने 10वीं का पाठ्यक्रम रख दिया गया हो.

डाकियों को हुई सबसे परेशानी

सबसे ज्यादा परेशानी डाकयों को हो रही थी. हिन्दी में लिखे होने के कारण उन्हें अधिकारियों की चिट्ठी हिन्दी में लिखे पते और पदनाम तक पहुंचाने में दिक्कतें होने लगी. उदाहरण के तौर पर उस डाकिये डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को समझते थें. लेकिन नई शब्दावली के आने के बाद डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ज़िला दंडाधिकारी हो गया. जिससे कि डाकिये पूरी तरह से अनभिज्ञ थें. इस वजह से पत्र को सही पते पर पहुंचाने में परेशानी होने लगी.

6 महीनों तक रही ये समस्या

 

हिन्दी की नई शब्दावली समझने की ये समस्या करीब 6 महीनों तक चली. उस सय डाकिये कहते थें कि हम किसी तरह पूछ-पूछकर, अंदाज़ा लगाकर पत्रों को सही अधिकारी और उसके पते पर पहुंचाते थें. जो हमारी समझ से परे था उसे वापस डाकघर वापस लेकर चले जाते थें.

ऐसे निकाला गया समाधान

डाकियो ं की ये समस्या जब पोस्ट मास्टर जनरल तक पहुंची तो उन्होंने तत्कालीन बिहार सरकार को लिखा कि आप इस समस्या का समाधान निकालें. उसके बाद जो समाधान निकाला गया. उसें सभी पदाधिकारियों के नाम और पदनामों की दोबारा सूची तैयार की गई. इस सूची में अधिकारियों के नाम और पदनाम हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में लिखा गया. इसे गुलजारबाग स्थित सरकारी प्रेस ने एक पुस्तिका के रूप में छापा. इसके बाद इसे डाक विभाग समेत दूसरे सरकारी विभागों को भेजा गया. इससे समस्या कम होनी शुरू हो गई.”